केमिकल लोचे के शिकार.....

पहचान कौन???

मेरी फ़ोटो
मैं कौन हूँ, मैं क्या कहूं? तुझमे भी तो शामिल हूँ मैं! तेरे बिन अधूरा हूँ! तुझसे ही तो कामिल हूँ मैं!

आपको पहले भी यहीं देखा है....!!!

शनिवार, 20 अक्टूबर 2012

ए फीलिंग कॉल्ड.....

निशां बाकी ना रहे वक़्त की रेत पर.....

इन अलमस्त लहरों से कहो के मिटाती  जाएँ!!!



इस अहसास को क्या कहते हैं,
नहीं मालूम मुझे!
पर जी चाहता है कि,
तेरी बाँह थामे ज़िंदगी का सफ़र कट जाए!
यूँही बेवजह खो जाएँ दोनों किसी अजनबी शहर में!
बेपरवाह घूमें, ना ढूँढें और ना ही राह पायें!

इस अहसास को क्या कहते हैं,
नहीं मालूम मुझे!
पर जी चाहता है कि,
अपने अश्कों से भिगो दूँ दामन तेरा!
मैं ज़ाहिर ना करूँ तुझपर सोज़ अपना,
मेरी ख़ामोशी का साज़ तू खुद ही समझ जाए!

इस अहसास को क्या कहते हैं,
नहीं मालूम मुझे!
पर जी चाहता है कि,
तेरी हँसी के आबशार में भीगता रहूँ!
बहती रहे तू कल-कल, पल-पल, अविरल!
मैं वजह देता जाऊँ और तू खिलखिलाए!

इस अहसास को क्या कहते हैं,
नहीं मालूम मुझे!
पर जी चाहता है कि,
साँसें साँसों में घुल जाएँ!
रूह रूह से जी भर के मिले गले!
किसी रोज़ इस सफ़र में तू मेरे इतने करीब आये!

इस अहसास को क्या कहते हैं,
नहीं मालूम मुझे!
पर जी चाहता है कि,
मैं बेफ़िक्र हो जाऊँ!
तुझे सौंपकर अपनी साँसों का हिसाब!
खुशियाँ जोड़े तू और ग़मों को घटाये!

इस अहसास को क्या कहते हैं,
नहीं मालूम मुझे!
पर जी चाहता है कि,
उड़ते रहें फ़लक पर हम!
तू डोर मैं पतंग, मैं सूफ़ी तू मलंग!
यूँही उड़ते-उड़ते इश्क़ की मे'राज आये!

इस अहसास को क्या कहते हैं,
नहीं मालूम मुझे!
पर जी चाहता है कि,
हर लम्हा घूँट-घूँट पियें हम!
इस जाम-ए-वस्ल के कैफ़ में डूबे-डूबे,
तेरा साथ हो और ज़िन्दगी की शाम आये! 

उर्दू हैल्पडेस्क:
सोज़: Grief, Pain  
आबशार: Waterfall  
मे'राज: Ascent, Ladder 
वस्ल: Union, Meeting, Connection 
कैफ़: Intoxication  

पी  एस/ डिस्क्लेमर: 
इश्क़ बेखुदी का दूसरा नाम है और ढ़पोरशंख खुदगर्ज़ी  का पहला ! 
अगर फिर भी कोई फ़ना होने पर आमादा हो, तो अल्लाह उसकी खैर करे!
फ़ैशन के इस दौर में गारण्टी की इच्छा ना करें!
हमारी कोई अन्य ब्रांच नहीं है! 
 
फोटू: गूगल घुमक्कड़

गुरुवार, 20 सितंबर 2012

सूफ़ी नूडल्स!!!

प्यारी सहेलियों और यारों,
पेश करते हैं "सूफ़ी नूडल्स". कृपया चबा कर खायें. स्वाद आने पर सूचित करें, ना आने पर ज़रूर बताएं.
(नोट: हाजमोला आदि का कोई क्लेम ढ़पोरशंख द्वारा एंटरटेन नहीं किया जाएगा. हमारी कोई ब्रांच नहीं.) 

दीवाना बना दे!!!

जब से किया अपनों ने बेगाना,
हर एक बेगाना अपना सा लगे है!
सपने मेरे लिए अब हैं हकीक़त,
हकीक़त मुझे सपना सा लगे है!

 तू कहता के मैं हूँ बेपरवाह सूफ़ी!
मुझको तो तू भी दीवाना सा लगे है!
तेरा कौन मज़हब, मेरी ज़ात कैसी?
मुझको तो तू भी इन्सां सा लगे है!

ये तमाशा-ए-दुनिया, ये भरम ज़िन्दगी का!
मेरे लिए हर पल एक महफ़िल!
तेरे 'अपने' तो हैं तेरे संग प्यारे!
फिर भी तू मुझको तनहा सा लगे है!

मुसल्ला सम्हाले, तस्बीह घुमाए!
नमाज़ पढ़े, मुझे काफ़िर बुलाये!
इतना यकीं है इस काफ़िर को उसपर!
वल्लाह! मुझे तो तू भी अल्लाह सा लगे है!
  
मंदिरों के घंटे, मस्जिद की अज़ानें!
उसतक पहुँचती है, ये कौन जाने?!
अल्लाह के घर का पता, क्या पता है?
रिंदों को मधुशाला भी शिवाला सा लगे है!

ज़िन्दगी एक सफ़र है और मैं एक मुसाफ़िर!
है मौत मंज़िल, बोसा मिलना है आखिर!
महबूब से मिलने की बेचैनी देखो!
रूह को मेरी, जिस्म क़फ़स सा लगे है!

क्यूँ है आब-दीदाह जो तेरा कोई गुज़रा!
ख़ाक और राख़ आखिर सबको मिले है!
तेरी शान-ओ-शौक़त, ये रानाई, ये रौनक़!
मुझे होने वाला बियाबां सा लगे है!

नेकी पर चलाता, बदी से बचाता!
डोले जो नीयत, कोहराम मचाता!
रिज़वान, निगाहबां, मुसल्लम ईमां!
ये दिल मुझको सच्चा मुसलमां सा लगे है!

हुस्न-ओ-इश्क़ का तालिब है!
महंगाई में 'सस्ता ग़ालिब' है!
अक्स जो देखा कल मैंने आईने में,
ये फ़कीर फ़रेबी ढ़पोरशंख सा लगे है!



हा हा हा...

ख्वाजा मेरे ख्वाजा! सूफ़ी नूडल्स खाजा!

उर्दू हैल्पडेस्क:
मुसल्ला: Prayer mat for Namaz
तस्बीह: Rosary Beads used for prayers
काफ़िर: Infidel, Non-believer
रिंद:  Drunkard, Free thinker
बोसा: Kiss (here, kiss of death)
क़फ़स: Cage, Body
आब-दीदाह: Tearful, In tears
रानाई: Beauty, Grace
बियाबां: Desert, Wilderness
रिज़वान: Guardian of Heaven
निगाहबां: Watchman, Guard
मुसल्लम: Entire, Complete
तालिब: Seeker
फोटूज़ : गूगल सूफ़ी

सोमवार, 20 अगस्त 2012

द टूरिस्ट!!!

प्यारी सहेलियों और यारों,
ये जो लाईफ है ना, लाईफ! ये एक लम्बे होलिडे जैसी है! आप और मैं हैं टूरिस्ट! मारुति के मानेसर में काम शुरू हो  गया है शायद, लेकिन 'मेरे सर' में अभी भी हड़ताल है! इसलिए मेरे ख्याल पर आप स्वयं अपने रिस्क पर सोचिये! मैं तो खानापूरी में कुछ वाहियात तुकबन्दियाँ ठेल रहा हूँ! थोड़ा जल्दी में हूँ! जाने कब ढ़पोरशंख टूरिस्ट की होलिडे  ख़त्म हो जाए! झेलिये:
(1) 
जब प्रवाह रुके किसी जल का,
 वो जल फिर मल बन जाता है!
बहता पानी प्रतीक है जीवन का,
दुनिया की प्यास बुझाता है!
उस जल की अविरल धारा सा,
 तुम मुझको हर पल बहने दो!
मैं हूँ आवारा बंजारा,
मुझको बस यूँही रहने दो!


(2)
जब ठहरे अचानक चलती पवन,
तन-मन व्याकुल हो जाता है!
मदमाती ताल जब देती हवा,
हर ज़र्रा सुर में गाता है!
उस पगली पवन को पत्तों से,
संदेस प्यार का कहने दो!
मैं हूँ आवारा बंजारा,
मुझको बस यूँही रहने दो!

(3)
जब बंधे हों पंख पखेरू के,
वो गीत उदास सा गाता है!
महका चहका उड़ता पंछी,
ख़्वाबों को पंख लगाता है!
उस पागल प्रेमी पंछी सा,
उन्मुक्त गगन में बहने दो!
मैं हूँ आवारा बंजारा,
मुझको बस यूँही रहने दो!


थोड़ी सी पंजाबी पुटपुटा रही है. चलिए फट्टे चकदे हैं:

ਜੇਡਿਯਾਂ ਯਾਰੀਯਾੰ ਪਾਈਯਾਂ ਰੂਹਾਂ ਨੇ,
ਓਹਨਾ ਦਾ ਕੀ ਕਰਿਏ ਕਰਾਰ!
ਸ਼ਰਤਾਂ ਨਾਲ ਹੁੰਦੇ ਸਮਝੌਤੇ,
ਕੀਮਤ ਨਹੀਂ ਮੰਗਦਾ ਸੁੱਚਾ ਪਯਾਰ!
ਰਸਮਾਂ ਕਸਮਾਂ ਨੂੰ ਛਡ ਬੀੱਬਾ,
ਓਹਦੇ ਲਯੀ ਹੈ ਏਹ ਕਮਲਾ ਸੰਸਾਰ!
ਪਰਵਾਹ ਕਿਸੇ ਦੀ ਕਯੂੰ ਕਰਿਏ ਅਸੀਂ?
ਚਲ ਉੜ ਚਲਿਏ ਗਗਨ ਦੇ ਪਾਰ!
ਤਮਾਸ਼ੇ ਵਾਂਗੂ ਏਹ ਜਿੰਦੜੀ ਹੈ,
ਲੇੰਦੀ ਰੇਹਂਦੀ ਨਿਤ ਨਵੇ ਆਕਾਰ!
ਹਰ ਲਮਹਾ ਜੀ ਲਈਏ ਰੱਜ ਕੇ,
ਮਲਾਲ ਨਾ ਹੋ ਜਦ ਹੋਵੇਂ ਸ਼ਿਕਾਰ!
A translation is in order for two reasons. You may not be familiar with Gurumukhi and more importantly my Punjabi is absolutely rudimentary. So, for those of you who can read the same, it becomes imminent that I convey, what I actually meant!!! Here it goes:
The friendships forged by souls do not need any contract! Terms and conditions are applicable to agreements and not true love which does not seek or extract a price!!!
Oh Dear! Just break away from the customs and traditions as they are meant for this mortal world! Why should the souls bother about anyone? Come! Let's fly together beyond the skies!!!
This life is nothing, but a play/ drama which keeps on changing tracks and forces us to live on its terms! Let us dictate the terms to life and live to the fullest, so that there is no regret at the time of bidding adieu when death tracks us down!!!


भूषण बाउजी ने पिछली पोस्ट इन लव विद......... डैथ!!! पर मेरे भरपेट दुश्वारियां खाने के बाद आई एक अदना सी डकार पर एक मज़ेदार कमेन्ट किया था: "........दुश्वारियों के बाद दो ही चीज़ें आती हैं- एक डकार और दूसरी द-कार. लगता है दूसरी भी आने वाली है किसी के साथ........"! बाउजी, बनिया ज़रा कच्चा है अभी हिसाब में! गौर फरमाइये:


ਅੱਗ ਦੇ ਵਿਚ ਜਲ ਜਾਣਾ ਏਹੇ, ਕੁਛ ਪਾਣੀ ਵਿਚ ਘੁਲ ਜਾਣਾ ਹੈ!
ਹਵਾ ਦੇ ਨਾਲ ਉੱਡ ਜਾਣਾ ਹੈ, ਬਾਕੀ ਮੱਟੀ ਵਿਚ ਮਿਲ ਜਾਣਾ ਹੈ!
ਜਿਉਂਦੇ ਜੀ ਆਜ਼ਾਦ ਹਾਂ ਮੈਂ, ਨਹੀਂ ਚਾਹਿਦੀ ਪਿੰਜਰ ਵਰਗੀ 'ਦ-ਕਾਰ'!!!


बाउजी तो मेरी टूटी-फ्रूटी पंजाबी समझ लेंगे, बाकियों के लिए विक्टोरिया आंटी की मदरटंग में ट्रांसलेशन:
The body is mortal. Once it dies, it will become one with Nature through various means like fire, water, air, soil etc. But as long as life is alive inside me, I shall be a free bird! I do not need 'the-car', which is nothing but the proverbial golden cage!!!
ईद मुबारक!
ढ़पोरशंख 
फोटू: बाबा गूगल शंख

शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

इन लव विद......... डैथ!!!

द लास्ट माईल 

मेरे जिस्म के पिंजर से एक रोज़,
उड़ जाएगा मेरी रूह का पंछी!
जब होगा मुझे विसाल-ए-यार!
मौला! क्या वो मंज़र होगा!

जब मौत की आग़ोश में सोऊंगा,
गेसूओं में ऊँगली पिरोऊंगा!
जब मिलेगा मुझसे मेरा यार,
मौला! क्या वो मंज़र होगा!

ज़िन्दगी को मैंने चाहा बहुत,
पर उसने मुझको दगा दिया!
जब करेगी मौत मुझे सच्चा प्यार,
मौला!  क्या वो मंज़र होगा!

रूठी ज़िन्दगी  को मनाने को,
जज़्बात लफ़्ज़ों में पिरोता रहा!
जब बन जाऊँगा मैं ख़ुद अश'आर,
मौला! क्या वो मंज़र होगा!

ज़ीस्त तुझे मुबारक हों,
ख़्वाबों से रोशन उजियारे!
जब होगा स्याह सच का दीदार,
मौला! क्या वो मंज़र होगा!

ना ग़म होगा ना कोई रंज,
ना कोई शुबा, ना कोई भरम!
जब होगा तुझपे ऐतबार,
मौला!  क्या वो मंज़र होगा!

मैं तेरे नूर से जुदा रहा,
कोसों पर मुझसे ख़ुदा रहा!
जब मिलूँगा तुझसे परवरदिगार.
मौला! क्या वो मंज़र होगा! 

तिलिस्म-ए-तिशनगी में खोया रहा,
खुली पलकों से भी सोया रहा!
जब कामिल होगी मेरी दरकार,
मौला!  क्या वो मंज़र होगा!

ना जाने कब आएगा वो पल?
जिस आज के बाद ना होगा कल!
जब होगा ख़त्म मेरा इंतज़ार,
मौला! क्या वो मंज़र होगा!

भरपेट दुशवारीयाँ खाने के बाद आई एक अदना सी डकार भर है बस, इससे ज़्यादा कुछ नहीं! 


उर्दू हैल्पडेस्क:
विसाल: Meeting 
मंज़र: Scene, Sight, View
आग़ोश: Lap, Embrace, Bosom
गेसू: Side locks, Hair
अश'आर: Verse, Couplet 
ज़ीस्त: Life
तिलिस्म: Magic, Charm
तिशनगी: Thirst, Desire, Longing
कामिल: Complete 
दरकार: Required, Desired
  
आज सच में और कुछ समझ नहीं आ रहा. चलते-चलते, बाजत रहिल ढ़पोरशंख: क्यूंकि ज़िन्दगी झूठ है और मौत सच, इसलिए ज़िन्दगी को सीरियसली नहीं सिंसियर्ली लीजिये! ख़ुश  रहिये! 
मौत का फोटू: गूगलशंख 

बुधवार, 20 जून 2012

द मंगली ट्यूसडे!!!

प्यारी सहेलियों और भाईयों,  
पिछले से पिछले मंगल को एक अनअवॉयडेबल सोशल सिचुएशन के चलते मंदिर जाना पड़ा. जैसे ही सीढ़ियों से अन्दर बढ़ा-चढ़ा तो देखा हनुमान जी मुस्कुरा रहे हैं. मैंने भी शिष्टाचार वश हाथ जोड़ के अभिनन्दन किया. मन से मैल जाता रहा और महसूस हुआ के मैं बिना वजह ही उनसे जूझता हूँ जिन्हें जग पूजता है. फिर शैतान खोपड़ी ने नोटिस किया के मुझे कोई स्पेशल वैलकम नहीं मिला था. हनुमानजी के फेस पे परमानेंट स्माईल थी जो सबको बराबर मिल रही थी. हाँ, प्रसाद ज़रूर मुझे नहीं मिला. पापा पंडित की जगह डेप्युटेशन पर ट्यूसडे मनाता छोटा पंडित शायद मेरे चेहरे से भांप गया हो के ढपोरशंख अनकम्फर्टेबल है. जिनके साथ गया था मंदिर, उन्होंने कह कर प्रसाद दिलवाया और टीका लगवाया.  हनुमानजी अब भी स्माईल कर रहे थे. मैंने मन ही मन बोल बच्चन किया: "आज खुश तो बहुत होंगे तुम.........."


जब दिल्ली में पढ़ा करता था, तो भी हर ट्यूसडे को हलवाई से बीस रुपये का गुलदाना खरीद के खुद को भोग लगा कर 'अहम् ब्रह्मास्मि' की फीलिंग ले लेता था. नौकरी इज़ नौकरी! में शायद आपने पढ़ा हो, जम्मू में डेप्युटेशन के दौरान, रघुनाथ मंदिर के आगे से सुबह-शाम निकलता. लेकिन न उसने बुलाया, न मैं गया! दरअसल, अपनी माँ के आगे मैं किसी को कुछ समझता नहीं था. फिर जिससे मिले नहीं, कभी बात नहीं की, जिसका वजूद केवल काल्पनिक कलेंडरों तक सीमित हो...........! खैर, अब माँ तो है नहीं! शायद कलेंडर वाले किसी भगवान ने ही मुझे मेरी औकात दिखाते हुए अर्श से फर्श पर पटक दिया हो. कमबख्त कोई खजूर भी नहीं मिला जिसमे अटक जाता! बैकयार्ड क्षतिग्रस्त है!


पता नहीं ये अंतिम कन्क्लुज़न है या नहीं, पर अंतरिम निष्कर्ष तो है ही. रिश्ते तकलीफ़ देते हैं. और भगवान के घर की तरह यहाँ भी देर तो हो सकती है, पर अंधेर नहीं! रिश्ते से याद आया, पिछली पोस्ट ढ़पोरशंख: द म्युज़िकल!!! में मैंने एक सांवली-सलोनी एकदम जड़ाजड़ पढ़ी-लिखी कन्या का ज़िक्र किया था. मैंने सोचा था के संगीत का ज्ञान रखने वाले उसके माता-पिता मेरे  ढ़पोरगान को सुन अपना विचार बदल देंगे! लेकिन हुआ इसका ठीक उल्टा. उनके मुझमे इंटरेस्ट शो करने से स्वाद तो बहुत आया!!! लेकिन हवा, बादल, नदी और सोच को कोई बाँध पाया है कभी? कास्ट का लॉजिक न चलने पर मैंने 'मंगली' कार्ड खेला. और बच गया मंगली मैनेजर!!!


चढ़ तो गए हैं, उतरेंगे कैसे?


चलिए, चलते-चलते चिपका देते हैं एक नादान परिंदे के आवारा अरमान:

गिनकर के मिली हैं साँसें सखी,
इन्हें बाँध नहीं मैं पाऊंगा!
ग़र क़ैद किया तूने मुझको,
बेवक़्त फ़ना हो जाऊँगा!!
 
बेहद आसमां की हद नापूं,
इसके सिरों को छूकर आऊंगा!
तेरी आँखें ग़र रस्ता देखेंगीं,
फिर तो हद में रह जाऊंगा!!


मेरे ज़हन को लगे हैं ख़्वाब के पर,
 हक़ीक़त में क्या जी पाऊंगा?
बन बंजारा बन-बन घूमूँगा,
कहीं ठहर, भला क्या पाऊंगा? 

 मेरी रूह भटकती जाने कहाँ?
वहाँ से ढूंढ के लाऊंगा!
जब चैन नहीं मुझे एक पल भी,
तुझको क्या सुकूं दे पाऊंगा?

मुझको है पता,  नादान हूँ मैं!
फिर भी मैं घर ना आऊंगा!
हालात से हार ना मानूंगा,
 आवारा अरमान सजाऊंगा! 

मेरी ज़ीस्त भले लिखती रहे दगा,
मैं वफ़ा ही पढ़ता जाऊँगा!
जिस दिन पा गया अपनी मंज़िल,
इन्श'अल्लाह हँसता हुआ जाऊँगा!

 उम्मीद ना रख कोई मुझसे तू,
खरा नहीं उतर पाऊंगा!
 मुझको भी तुझसे कोई आस नहीं,
मैं भी कोई हक़ ना जताऊंगा!

अहसासों का क्यूँ कोई नाम रखें?
रिश्ता नहीं निभा कोई पाऊंगा!
ज़रा पंख फैला, संग दोस्त उड़ें!
खुशियों के शहर ले जाऊँगा! 

वैधानिक चेतावनी:
1. महंगाई और फ़ैशन के इस दौर में गारंटी की इच्छा ना करें! 
2. पागलों के सींग नहीं होते!
3. बादल अर्ज़ी सबकी सुनते हैं, पर बरसते हैं अपनी मर्ज़ी से!
4. रिश्ते तकलीफ़ देते हैं!
5. धुम्रपान से कैंसर होता है!
 पगले पिजन्स: गूगलशंख

रविवार, 20 मई 2012

ढ़पोरशंख: द म्युज़िकल!!!

प्यारी सहेलियों और भाईयों,
आपको तो पता है चौड़े में झप ताल कराने का शौक़ पुराना है मेरा. सिवालखास में  बैंक के बाहर अपनी धन्नो समेत नाली  से मधुर आलिंगन का एक्सपेरिमेंट आपसे साझा किया था: द डर्टी पिक्चर में!  इस पोस्ट में भी कुछ ऐसा शेयर कर रहा हूँ!
पिछले से पिछले सन्डे को मेरा संगीत का प्रैक्टिकल था. तैयारी भी थी. मुझसे ज़्यादा मेहनत की थी मेरी गुरु ने. और आज मौका था, ढ़पोरशंख को सुर में बजाने का. इससे पहले कि मेरा नंबर आता, सेंटर संचालिका के बैटर हाफ मुझसे मैट्रीमोनियल जी.के. बढ़ाने  लगे. मैं राग यमन कल्याण की फीलिंग ले ही रहा था के वो विवादी स्वर की तरह पूछने लगे, "बेटा, क्या करते हैं आप? कहाँ रहते हैं? डेट ऑफ़ बर्थ क्या है? शर्मा हैं?" 
क्या अंकल!! शरमाये तो हम पैदा होते समय भी नहीं! जबकि एकदम कोरे पैदा हुए थे, हमारी माँ भी लेडीज़ थी और डॉक्टर आंटी भी! पर हमें लगा के जिस कन्या के संबंध में वो मेरी हेलो-टेस्टिंग कर रहे थे वो सांवली-सलोनी एकदम जड़ाजड़ पढ़ी-लिखी और सबसे बड़ी बात सुर में थी! दूसरे, के इस शादियों वाले सीज़न में कितनी ही सहेलियों का मैं 'बेस्ट-फ्रैंड' भर रह गया!!! इसलिए हमने तमीज की कमीज पहन के कहा के हम बनिये हैं, और सोचा के शर्माने से क्या हासिल होगा? कोशिश कीजिये और आप भी देश के अच्छे नागरिक बनिये!
तब तक यमन का तीव्र मध्यम अपनी जगह से हट चुका था और कल्पनाओं का तानपुरा किसी एक सप्तक में ठहरने को तैयार ही नहीं था. बाहर करारी धूप खिल रही थी और मन-मयूर राग मल्हार के साथ बरखा में भीग रहा था. 
ऐसी स्थिति में एक्ज़ामिनर ने मेरा नाम पुकारा और कहा: 'पेश किया जाये'!!! और मैंने फिर जो 'सा' लगाया, तो बाजा अलग, तबला अलग, सुर अलग, तान अलग, लय अलग, ताल अलग. वो तो अच्छा हुआ के मुझे ज़्यादा आता नहीं था, वरना मैं न जाने क्या-क्या अलग कर देता! खैर रायता मैंने इतना फैलाया के जान बचाने के लिए एक्ज़ामिनर बोले: कुछ और सुनाइये! फिर धरातल पर पैर टिका कर मैंने उन्हें राग बिहाग सुनाया और अपनी और उससे भी ज्यादा अपनी गुरु  की मिट्टी  पलीत होने से बचाई! और चलते-चलते पंजाबी में एक  सूफ़ियाना कलाम भी चिपका ही दिया! 
बाजत रहिल ढ़पोरशंख!!!

कुल मिलाके यूँ है के अब ढ़पोरशंख हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायन में 'मध्यमा प्रथम' हो चुका  है! और आगे चढ़ाई जारी है!  चढ़ने पर चिपकाते हुए चलते हैं:

एड़ियाँ उचका के मैं,
क्यूँ न छू लूँ आसमां?
नाकाम भी रहा अगर,
कुछ कद मेरा बढ़ जाएगा!

न हुआ हासिल मुझे,
ग़र क़ामयाबी का मकां!
हाथ छोटा ही सही!
कोना-ए-तजुर्बा आएगा!

क्यूँ न खुल के साँस लूं?
जी भर के मैं जी लूं ज़रा!
कतरा-कतरा जीने में,
क्या मज़ा कोई आएगा? 

और भैय्ये, और कुछ आये या ना आये मज़ा नहीं आया तो क्या आया? जब तक मुझे कुछ और नहीं सूझता, तब तक ज़िंदगी को सीरियसली नहीं सिंसियरली लीजिये! खुश रहिये!!!
शंख का फोटू: गूगल महाराज

शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012

द नेम इज शंख, ढ़पोरशंख!!!

प्यारी सहेलियों और भाइयों,
आजकल फुल वाट लगी पड़ेली है! तमराज किलविष (ऐसा ही कुछ था, न!?) मुझे लगातार पटखनी दे रहा है. मैं शक्तिमान टाईप्स घूम-घूम कर उसे हराने की कोशिश करता हूँ और खुद हार जाता हूँ. और फिर वो जले पर नमक छिड़कता हुआ, लम्बे-लम्बे नाखून वाली उंगलियाँ हिलाता हुआ कहता है: "अँधेरा कायम रहे"!!! रहा-सहा होंसला भी पस्त हो जाता है! लेकिन हम तो उन वाहियातों में से हैं जो बड़ी बेशर्मी से हाथ-पैर इकठ्ठा कर फिर खड़े हो जाते हैं: "तमराज अंकल, एक राऊंड और!!" ऐसे में एक पुरानी कविता (या जो कुछ भी कह लो यार!!!) याद आती है. साझा कर रहा हूँ आपसे:

नन्हा सा चिराग...

दूर कहीं एक,
नन्हा सा चिराग...
और मैं!

मुझे निगलता अँधेरा...
अँधेरे को निगलता चिराग!

जीत कर हारता मैं...
हारकर जीतता चिराग!

जल-जल कर बुझता मैं...
बुझ-बुझ कर जलता चिराग!

दूसरों पर निर्भर मैं...
वहीं, खुद ही बलता चिराग!

आँधियों में बिखरता मैं...
थपेड़ों से लड़ता चिराग!

पल-पल मुरझाता मैं...
हर पल खिलता चिराग!

डरा-सहमा सा मैं...
बेख़ौफ़ जलता चिराग!

खुद के लिए जीता मैं...
ग़ैरों के लिए जलता चिराग!!! 


अब एकदम फ्रेश स्वरचित "निर्मल" जोक!!! 
(वैधानिक चेतावनी: केवल इंटेलेक्चुअल्स के लिए) 
स्थान: 
एक बड़े ऑडिटोरियम में हो रहा 'धनागम', सॉरी, आई मीन समागम. मौजूद लगभग पांच हज़ार लोग, बाबा जी और उनके चेले-चपाटे. 


महिला, बाबा से: 
बाबा जी के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम. 
आपका ही सिमरन अब सुबह-ओ-शाम!  
बाबा जी मेरा नाम है रति,
और मेरे पास है अपना एक्सक्लूज़िव पति, 
पर नहीं हो पा रही थी मैं गर्भवती!!!
फिर टी वी के माध्यम से आपसे जुड़ी,
खूब खाए गोल-गप्पे और चाट-पकोड़ी!
हो गयी बाबा आपकी ऐसी कृपा!
एक महीने में ही नौ बच्चों को जन्म दिया!!!


बाबा, महिला से:
दसवां बच्चा क्यूँ भूल रही हो?
बाबा की कृपा को कम तौल रही हो?
दरअसल तुमने दस बच्चों को जना था,
नहीं दोगी 'दसवंद', हमको पता था!
जबसे मीडिया ने हमारी भद्द पीट दी है!
डीडीएस* की कटौती हमने शुरू कर दी है!      

*डीडीएस: दसवंद डिडकटिड एट सोर्स   

(क्यूंकि, जानकारी ही बचाव है, इसलिए बता दूं कि, लेखक की अलमारी में दस की नयी गड्डी और उसकी जेब में काला पर्स मौजूद हैं.)    
 
क्या किसी को पता है, ढ़पोरशंख क्या होता है? मोनाली ने हाथ खड़े कर दिए हैं और मनोज खत्री कल ही पिछली पोस्ट पर ये चिपका कर गए हैं: 'तुम कहीं ढपोर शंख नहीं हो...'
क्या कोई अल्लाह का बंदा बताएगा? इट्स ए कुएस्चन ऑफ़ समवन'स "अस्तित्व", यू सी!!!  
सर्वाधिकार असुरक्षित!!! 

मंगलवार, 20 मार्च 2012

द रिवोल्ट ऑफ़ ए कन्फयूज़्ड सोल!!!

प्यारी सहेलियों और यारों,
इस मुई 'दो टकिये की नौकरी' में अनमोल यौवन, बेशकीमती फ्लर्टपन, करोड़ों के जीवन और लाखों के सावन के अलावा बहुत कुछ ज़ाया जा रहा है! और उस बहुत कुछ में सबसे ऊपर आता है, सहेलियों और यारों का ब्लॉग लेखन!!!
एट द आऊटसेट, आप सभी को बराबर न पढ़ पाने का खेद है और इसलिए मेरे न्योते पे या अपने-आप, आप जैसे भी आये हैं, धन्यवाद! ख़ुदा आपको सलामत रखे और आपको मेरे जैसे फूहड़ वहियातों के अलावा पढ़े-लिखे प्रशंसक भी बहुतायत में मिलें!!!
आज की पोस्ट कुछ अलाहदा है. क्यूँ? क्यूंकि आज मैंने सोच के लिखा है! बस यही एक जोक मिलेगा आज! काफी संजीदा बातें हैं जो तुकबंदी में पिरोई हैं. 'स्टेटस कुओ' के खिलाफ, ढपोरशंख की आवाज़, बोले तो 'द रिवोल्ट ऑफ़ ए कन्फयूज़्ड सोल'!!!

(१)
अपना मिज़ाज मजाज़ है!
ठोकर पर तख़्त-ओ-ताज है!
मैं कल भी सरफ़राज़ था!
शादान अपना आज है!

बे-अदब और बेबाक है!
अपना तो जो अंदाज़ है!
आप क्यूँ शर्मसार हैं?
मुझको तो खुद पर नाज़ है!

ख़ुदा ने ऐ रफ़ीक,
बख्शी दोनों को है जुबां!
मेरे पास ही मगर, 
जिगर और आवाज़ है!

वक़्त ने क़तर लिए हैं,
आपके पर हुज़ूर!
मेरे पास वक़्त है,
पर है और परवाज़ है!

(२)

नादान सही, शादान तो है!
आवारा सही, अरमान तो है!
पैर बंधे, और कतरे पर!
फिर भी, सपनों में उड़ान तो है!

(३)
   क्यूँ रस्मों की बेड़ी बाँधूं?
क्यूँ रिवाज़ों के पिंजर में रहूँ?
मेरा जिस्म गिरफ़्त में ले लो बेशक!
क्या कर पाओगे क़ैद मेरी रूह? 

जैसा तू कहे, वैसा मैं करूँ!
है कोई वजह, ऐसा मैं करूँ?
क्यूँ न मेरी खुद की मंज़िल हो?
क्यूँ न मैं खुद की रह चुनूं?

तेरी दुनिया, तेरा समाज!
तेरा निज़ाम और तेरा राज!
क्यूँ न मैं बग़ावत कर बैठूं?
नए दौर का फिर आग़ाज़ करूँ!

जब झूठ है सब कुछ माया है!
सच नहीं है कुछ, सब साया है!
स्याह रात घनघोर तमस बाहर!
मेरे भीतर रोशन उसकी लौ!!

(४)
हमसे कहे कोई कुछ कहाँ सुना करते हैं हम!
बावरे बादल है, गरजते हैं मर्ज़ी से, बरसते हैं मर्ज़ी से!    
उर्दू हैल्पडेस्क:
मिज़ाज: Temperament, Disposition.
मजाज़: Illusive.
सरफ़राज़: Superior.
शादान: Happy, Jovial.
रफ़ीक: Friend.
परवाज़: Flight.
निज़ाम: Order, Arrangement.

सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

द डर्टी पिक्चर!!!

इस पोस्ट का रिलेशन विद्या बालन या उनकी फिल्म से नहीं है. इनफैक्ट, मैंने वो फिल्म देखी ही नहीं! ये मेरी वही चीप और पुरानी टेक्टिक है ध्यान अट्रैक्ट करने वाले टाईटल रखने की! हाँ, पर पोस्ट से टाईटल का रिलेशन है. कैसे? पोस्ट पढ़ जाओ, खुद जान जाओ! 
पिछले कुछ दिनों में डेप्युटेशन पर सिवालखास में था. वहाँ का अफ़सर ब्याह रचाने गया, और कीमत चुकाई बैंक ने और मैंने!!! संजय बाऊ जी/ भूषण बाऊ जी कहेंगे के भैय्ये डेप्युटेशन तो 'ऐश विद कैश' होती है, तो मैंने कैसे कीमत चुकाई? "द डर्टी पिक्चर'' बनाके! हुआ यूं, के एक शाम को ब्रांच के बाहर चबूतरे से भूतल पर उतरते हुए डिसबैलेंस हुआ और अपनी धन्नो के साथ गिर गया ब्रांच के सामने "बड़ी सी नाली" या "छोटे से नाले" में!!! लोगों को बेइंतहा दारु पी के नालियों की सांवली-सलोनी रसमलाई नसीब होती है, हम तो बिना दारु के ही ढिंका-चिका हो गए! इतने गन्दा तो नहीं हुआ के नायक का अनिल कपूर बन पाऊँ, हाँ मगर डर्टी पिक्चर का पोस्टर तो बन ही गया!!!
वहां खड़े लोगों का बहुत हुआ: एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट!!! मेरा क्लर्क हंसी दबाते हुए बोला, "अरे सर, आप तो गिर गए!!!" मैंने कहा, "मैं तो पहले से ही गिरा हुआ हूँ!" गिरने पे एक बेहद वाहियात और मामूली तुकबंदिये ने सोचालय में इस घटना से प्रेरित होकर ये सबक लिखा है, नोश फरमाएं:
बुरा नहीं है जग में गिरना,
गिरकर न उठाना, मगर बुरा है!
परवाज़ न टूटी जिसकी कभी भी,
बेशक है वो ज़फर परिंदा!
पर पर काटे किस्मत ने जिसके,
वो बेहतर है गर, फिर भी उड़ा है!!! 
ख़ैर, उस रात जो नहा-धो के लेटे अगली सुबह ही उठे! दफ़्तर जाते समय हनुमान चौक के पास देखा के एक स्कूटर और मोटरसाईकल ज़मीदोज़ पड़े हैं. स्कूटर वाले अंकल, मोटरसाईकल वाले स्कूली बच्चों से उलझ रहे हैं. बच्चे हाथ जोड़ रहे हैं और अंकल रणतुंगा की फुल फीलिंग ले रहे हैं. पब्लिक एज़ युज़ुअल एन्जॉय कर रही है! मैंने धन्नो साईड स्टैंड पे लगाई. एक साईड हीरो और एक जूनियर आर्टिस्ट की मदद से बच्चों की मोटरसाईकल और अंकल का फटीचर स्कूटर उठाया और पूछा किसी को चोट तो नहीं लगी? जब जवाब 'न' में मिला तो पंचम स्वर में बोला, "जाने दो न अंकल! ये तो कुछ भी नहीं, मैं तो कल नाली में गिर गया था!" माहौल टेंस से थोडा लाईट हुआ और पब्लिक जो अब तक सिर्फ शूटिंग देख रही थी हंस पड़ी और कुछेक लोगों ने बीच-बचाव टाईप के डायलोग चिपकाए!
गाँव में काम करने का एक अलग ही आनंद है. पर एक चीज़ अटपटी लगी, कुछ खासे बुज़ुर्ग लोगों का मुझे अंकल कहना! "अंकल!!! अंकल!!! अंकल!!!" बहुत बाद में अहसास हुआ के वो सिर्फ मेरे अच्छे बर्ताव के चलते इज्ज़त बख्श रहे हैं! अंकल मतलब जेंटलमैन!!!  
अंकलजी का लेटेस्ट फोटू. एक प्यारी सी आंटीजी ने खींचा. मगर आप किसी से न कहना!!!

एक दूसरी आंटी अपनी लाईफ की एक अहम इनिंग्स शुरू करने जा रही हैं. मेरी लैब से उनके लिए लाईफ की थीसिस:

ज़िन्दगी के इस सफ़र में,
बन न सके हम हमसफ़र!
किसकी खता, किसको पता?
जुदा हुई मगर अपनी डगर!

फिर भी तेरी आँखों के पानी में,
मौजूद शायद मैं कहीं!
तेरी यादें भी मेरे ज़हन को,
खटखटाती कभी-कभी!

उन सांझे पलों का तुझे,
वास्ता है ऐ रफीक़!
  बेशक मुझे तू भूल जा!
पर आबाद रह और शाद रह!

किसी बात का न मलाल कर!
न अपना हाल बेहाल कर!
ग़ैरों के लिए जिया बहुत!
अब ज़रा खुद से प्यार कर!

घूँट भर महताब का!
स्याह रातों को कर फ़ना!
   हथेलियों पर सजाले धूप की,
गुनगुनाती सी हिना!

कायनात का खुदा का तुझे,
वास्ता है ऐ रफीक!
बेशक मुझे तू भूल जा!
   पर आबाद रह और शाद रह!
     
और आप भी! ज़िंदगी के चुटकुले को सीरियसली नहीं, सिंसियरली लीजिये!!! स्टे हैप्पी! खुश रहो ना यार! 



वैधानिक चेतावनी: 
इस ढपोरशंखी को आप हल्के में लेना छोड़ दीजिये! ये अब सी.ए.आई.आई.बी. हो चुका है. अगर बैंकर हो तो समझ गए होंगे, अगर नहीं तो समझ नहीं पाओगे! 
हाँ इसकी मम्मी ज़रूर खुश होंगी! मे हर सोल रेस्ट इन पीस! 
उफ़! ये इमोशनल अत्याचार! चलो, ख़तम हुआ! कमेन्ट चिपकाओ और चलते बनो!

शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

द कॉमेडी कॉल्ड लाईफ़!!!


ब्लॉग का टाईटल है: माई एक्सपेरिमेंट्स विद लव एंड लाईफ़! ये और बात है के पिछले कुछ समय से लाईफ़ इज़ एक्सपेरीमेंटिंग विद मी और लव?! लव तो ऐसा हो गया है जैसे किसी फ़िल्म का आईटम सॉन्ग. एकदम ढिनचैक, चमकीला, फुट-टैपिंग, फैंटाबुलास्टिक, और जल्द ही ख़त्म हो जाने वाला! मैं टेस्ट मैच खेलना चाहता हूँ, पर कोई वन-डे तक ठहरता है तो कोई बस ट्वेंटी-ट्वेंटी!

पर आज लव नहीं, लाईफ़ के बारे में गुफ़्तगू करूंगा आपसे. ज़्यादा तो नहीं, पर टक्कर खाके जितना मैं समझ पाया हूँ, ये एक कॉमेडी जैसी है. इसे एक तमाशबीन की तरह देखो तो तालियाँ बजाने के मौके भरपूर मिलेंगे और अगर इसमें अपने रोल को सच मानकर जीने लगोगे तो तकलीफ़ उठानी पड़ेगी! जी हाँ, तमाशा! इस ज़िंदगी के बारे में सब कुछ, सब कुछ झूठ है. अगर कुछ सच है, तो वो है मौत! आप-मैं, हम सब इस बात को जान कर भी अनजान बनते हैं. हम तमाम उम्र गुज़ार देते हैं झूठ को सच की तरह जीकर, और सच को एक झूठ मानकर अनदेखा सा कर देते हैं. 

और जब ज़िंदगी का एकमात्र सच रहपटा मारकर फेसलुक चेंज करता है तो अहसास होता है के भैय्ये जो चला गया वो तो चिरकुट पे फेक प्रोफाईल जैसा था. 

आज आशीष का बर्थडे है और उसकी माँ ने उसे विश भी नहीं किया! डायलोग तो अच्छा लगता है के वो नहीं है पर उनका आशीष हमेशा आशीष के साथ है. लेकिन, सच तो ये है के वो नहीं है और न आएगी! अब आप इसे मेरी असंवेदनशीलता कहिये या जज़्बाती खोखलापन, मैं इसे वास्तविकता का नाम देता हूँ!

चलिए कुछ ठेल देता हूँ, हज़म कर पाए तो 'दोहे' कह लीजियेगा और मुझे इसी बहाने सेहरा बंध जाएगा एक लुप्तप्राय विधा को कुछ साँसे देने का. और हज़म नहीं हुआ तो भैय्ये, हम तो हैं ही लाईसेंसी ढपोरशंख, सर्वाधिकार असुरक्षित!!! भूल गए?
(१)
आज मेरी कल तेरी बारी,
जाने, न माने पर दुनिया सारी I
जो कुछ पाकर तू हर्षाये,
लोकपाल है वो सरकारी II

(२)
मान अकड़ सब पड़ता ढ़ीला,
टूटे जब जीवन से यारी I
मिट्टी, बॉडी बन उठ जाती,
अब तक थी जो काया प्यारी II


(३)
कोलावरी डी नहीं चलता है,
आती जब अंकल यम की फरारी I
सबका 'दी एंड' वही एक सा,
करोड़पति हो या मात्र हज़ारी II

(४)
महल, मीनारें, मोटर, माया,
और भी तेरी चीज़ें न्यारी I
संगी-साथी संग न जाएँ,
जब होती है 'दी लास्ट सफ़ारी' II

(५)
एक दिन होता है शिकार खुद,
मामूली हो या फेमस शिकारी I
 कहत असीस सुनो भई साधो,
  मसखरी करना आदत है हमारी II
ज़िंदगी से ज़िंदगी वापिस चुरा रहा हूँ धीरे-धीरे. हिम्मत करके निकला हूँ बाहर उन स्याह अंधेरों से जो मुझे निगलना चाह रहे थे. क्लासिकल म्युज़िक सीखना शुरू कर दिया है. थोडा सा शो-ऑफ़ करूँ तो, संगीत विशारद कर रहा हूँ, गान्धर्व महाविद्यालय से. आज ब्लॉग भी लिख दिया. उम्मीद है जारी रख पाऊंगा. अगर ज़िंदगी रही तो और अगर ये हो सका तो, ज़िन्दगी की अगली किस्त, 20 फरवरी को.  



ये तो मैं पहले से ही कहता आया हूँ के ज़िंदगी को सीरियसली नहीं सिंसियरली लीजिये. आज उसका कारण भी बता दिया: लाईफ़ इज़ ए जोक!!!