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बुधवार, 28 अक्तूबर 2009

शादी: एक रूहानी रिश्ते की जिस्मानी शुरुवात?

सभी कर्म-कांडों का विधि-वत् पालन करते हुए, वैदिक मंत्रोच्चार एवं धार्मिक अनुष्ठानों के बीच एक और जोड़ा जन्मों-जन्मों के बंधन में बंध गया।लड़की हालाँकि, मुस्कुरा रही थी, अभिवादन स्वीकार कर रही थी, और सखियों-सहेलियों की हंसी-ठिठोली का दबी जुबान में जवाब भी दे रही थी; लेकिन कहीं न कहीं उसकी आँखों में अपरिचित और अनिश्चित का डर तैरता हुआ नज़र आ रहा था। भविष्य के गर्भ में आखिर क्या छुपा है, ये सोच घबरा रही थी। वहीं लड़का कुछ शराब के और कुछ प्राप्त होने वाली सत्ता के नशे में उन्मत्त था। मैं दूल्हे के मित्र की हैसियत से वहां था, तो निश्चित तौर पर मैं उसे जानता हूँ। पढ़ा-लिखा होने के बावजूद उसके विचार महिलाओं के बारे में उन्नीसवीं शताब्दी हैं।

बात कब की है और किस के विवाह की, ये अहम नहीं है। जो अहम है, जो खास है वह ये के क्या ईश्वर को साक्षी मानकर एक द्विज (ब्राह्मण) की उपस्थिति में होने वाला परंपरागत विवाह क्या वास्तव में एक रूहानी रिश्ता है या केवल उसकी सम्भावना जो हो भी सकती है, नहीं भी।

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दूल्हे राजा से मुलाक़ात का वक़्त है। सारे दोस्त जमा हैं और जशन का वक़्त है। जैसा की ऐसी मुलाकातों में होता ही है कुछ लड़के उत्सुक हैं ये जानने के लिए के क्या हुआ? वहीँ कुछ घोषणाएं कर रहे हैं कि ये कुछ नहीं कर पाया होगा! और दूल्हे राजा अपने पराक्रम और शौर्य कि डींगें हांक रहे हैं। झूठ नहीं बोलूँगा आपसे, मैं भी ऐसी मुलाकातों का आनंद लेता आया हूँ। ज़ाहिर है सुहाग कि सेज पर दूल्हे से अपनी 'ब्याहता पत्नी' के आचार-विचार जानने कि अपेक्षा नहीं की जा सकती। स्वाभाविक रूप से उसे 'आकार-विकार' जानने की दिलचस्पी, रोमांच और बेसब्री रहती है। पर क्या यह जिस्मानी शुरुवात एक रूहानी रिश्ते में तब्दील हो पाती है? जवाब फिर से वही, हो भी सकती है नहीं भी!
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क्या आप अपने आस-पास रहने वाले किसी ऐसे दंपत्ति को नहीं जानते जिनकी शादी एक कमज़ोर बुनियाद पर डगमगाती हुई समझौते (कोम्प्रोमाईज़) की इमारत है जो केवल बदनामी और बच्चों के भविष्य के बिखरने से बचने के लिए खड़ी है? ज्ञात रहे के समझौते में कोई नहीं जीतता और यह एक नकारात्मक प्रक्रिया है।

क्या समायोजन (एडजस्टमेंट) एक बेहतर विकल्प नहीं है, जहाँ दोनों ही पक्ष जीतते हैं, हारता कोई नहीं? ध्यान देने योग्य बात ये है के समायोजन केवल एक मज़बूत रूहानी रिश्ते की बुनियाद पर ही सम्भव है।

तो क्या पारंपरिक आयोजित विवाह प्रासंगिक नहीं रहे? क्या प्रेम विवाह इस समस्या का समाधान है? क्या जीव विज्ञान का आनंद लेने से पहले मनोविज्ञान पास करना सही तरीका है?

मैं तो किसी नतीजे पर नहीं पहुँच पाया। आप बताईये.....

23 टिप्‍पणियां:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

विवाह समझोते से ही चलता है। किसी रूहानी संबंध के लिए विवाह की कोई आवश्यकता नहीं है और न ही जिस्मानी संबंध के लिए। लेकिन जिस्मानी संबंध बच्चे पैदा करते हैं। मनुष्य संपत्ति धारण करता है और बनाता भी है। पुरुष चाहता है कि संपत्ति उस की उस की संतान को प्राप्त हो। विवाह संतान के पितृत्व की स्थापना के कारण ही उत्पन्न हुआ है। कालातंर में उस के साथ अनेक बातें जुड़ी और जोड़ दी गईँ। जिस दिन दुनिया से व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणा नहीं रहेगी। विवाह भी समाप्त हो जाएगा।

परमजीत बाली ने कहा…

कोई किसी से किस तरह के संबंध बनाता है\यह अलग बात है.....लेकिन जहाँ तक दॆखने मे आता है यह एक समझोता ही होता है।द्धिवेदी जी ने ठीक कहा है कि रूहानी संबंध के लिए विवाह आअश्यक नही होता।
यह अलग बात है कि विवाह के साथ यदि रूहानी संबंध भी बन जाए तो बेहतर है लेकिन ऐसा नही के बराबर ही देखने में आता है.....जैसे कबीर जी का ऐसा ही संबंध बना था अपनी पत्नी से।
अभी विवाह ऐसी स्थिति में नही पहुँचे की प्रासंगिक ना रहे।

विजयप्रकाश ने कहा…

आशीष जी, लेख में आपने अच्छे, विचारोत्तेजक प्रश्न उठाऐ हैं.क्योंकि मैं ज्योतिषीय सलाहकार भी हूं अतः मेरा अनुभव विवाह-संबंधो के मामले में एक आम आदमी से अधिक हैं.
मैंने ज्योतिष से इतर जो बातें अनुभव की है वह आप से बांट रहा हूं.
विवाह मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं.पहले जीवनसाथी पसन्द किया फिर विवाह या पहले विवाह फिर जीवनसाथी पसन्द किया या नापसन्द किया.
ये सारी चीजें समय काल और स्थिति के अनुसार निर्धारित होती हैं.
समय यानी आपकी आयु, मानसिकता.काल यानी वर्तमान जिस पर आपका भविष्य टिका है. स्थिति यानी आपकी शारीरिक अवस्था,धन की अवस्था, सामाजिक स्थिति. इन सारे"फैक्टर्स" का जहां और जब तक संतुलन रहता है तब तक वो संबंध अच्छा लगता है, चलता है ,निभता है.
अब पच्चीस की आयु में मानसिक परिपक्वता उतनी नहीं हो सकती जितनी चालीस की आयु में.अगर आदमी वर्तमान में "वेलसेट्ल्ड"है, (जिसके अलग अलग लोगों में अलग अलग पैमाने हैं) तो आदमी एक नहीं दो रिश्ते भी निभा जाता है.अब जैसे माना जाता है कि शारीरिक अवस्था का आयु से संबंध होता है जब कि पाया गया है ये कई लोगों में नहीं भी होता क्यों कि उनकी मानसिक स्थिति अच्छी होती है .
तो हमारे अनुभव में तो यही आया है कि विवाह चाहे पहले प्रकार का हो या दूसरे प्रकार का, मानवीय भावनाओं का , संवेदनाओं का, सामाजिक स्थिति का, वित्तीय स्थिति का मेल अगर बराबर हो तो बात जम जाती है. केवल शारीरिक संबंध से बात नहीं बनती, मानसिक संबंध भी बनने चाहिये.
हां अगर कहीं कमी पड़ती है जैसे चार चीजें मिल रही हैं और एक नहीं भी मिल रही है तो समझौता ही
होता है और होना भी चाहिये.

Suman ने कहा…

जिस दिन दुनिया से व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणा नहीं रहेगी। विवाह भी समाप्त हो जाएगा।दिनेशराय द्विवेदी se shamat hu.

ASHISH ने कहा…

हालाँकि, बाली जी छाया चित्र में मुझसे छोटे ही नज़र आते हैं (हाहा...), लेकिन आपकी ओर द्विवेदी जी की प्रतिक्रिया से जहाँ एक ओर तजुर्बे और दुनियादारी की छाप मिलती है, वहीं ना जने क्यूँ पुरातन का अहसास भी होता है। या फिर ऐसा भी हो सकता है के मेरी अनुभव हीनता के चलते ही मैं शायद अधिक अपेक्षा रख रहा हूँ, विवाह जैसे सम्बन्ध से जिसे आपने संतान उत्पत्ति का जरिया माना है। अंततोगत्वा, आप के विचार इस ओर ही इंगित करते हैं के विवाह मूलतः समझौता ही है, हाँ समायोजन हो पाए तो क्या बात है.......

Shilpa ने कहा…

Physical relations in or out marriage widout meeting of souls is a sheer injustification atleast 2 d oaths of marr whr d 2 promise 2 devote demselves wid "Tan, Mann, Dhan".
According 2 our Mgmt theories also, Compromise cnt b a "Win-Win" situation. Compatibility can b nourished only by makng Adjustments nt Compromises, bt most marrgs cnt follow dis principle. Acc 2 a recent study 86% of Indian women Compromise on bed evry nite, vich clears up d existing scenario.
So guys n gals, being single is d best option.
All d best!!!!!!!!!!!!!!!!!

ASHISH ने कहा…

विजय प्रकाश जी,
सर्व प्रथम धन्यवाद्।
कर्मों के सिद्धांत में मैं भी मानता हूँ। न जाने क्यूँ, फिर भी हमे ऐसा लगता है के भाग्य पर हमारा बस चल जाएगा?
चलिए, अब आपसे परिचय हो जाएगा तो सहायता लूँगा, आयु, काल, वर्तमान, भविष्य का तारतम्य बैठाने में.....

ASHISH ने कहा…

Shilpa,
Adjustment is any day a better alternative to compromise, and this is precisely the point that I want to put across.....
You seem to me a staunch feminist.....
However, staying single is probably taking things too far, at least this is what I think!!!
It is worth a try..... :-)

शरद कोकास ने कहा…

प्रेम हो या विवाह सबकी एक न दिखाई देने वाली एक्स्पायरी डेट होती है ।

ASHISH ने कहा…

शरद जी,
मेरे विचार आपसे भिन्न हैं:

मुहब्बत का रंग छूटता कहाँ है?
ये पाकीजा रिश्ता टूटता कहाँ है?

jd ने कहा…

it is up to u how u feel about the relations. Before 1960's relation really starts from physical relations, girl don't know nothing about the boy, but gradually relations converts in to love . u can understand this in the eyes of ur parents & grandparents.
u can say feeling of belongingness starts from physical relations, then they make a picture in mind & start loving that one. i hope this is real love, because they accept them as they r .
But now days relation starts from physical to be in real, but sorry they don't want to accept them as they r , bcz they r not bind in any obligation,but if they r ,they don't bother about this, bcz love has lost between the bodies, feeling of belongingness is crushed between the feets, nothing is left as obligation.
LOVE IS STILL SAME AS IT WAS . But people has frgotten the meaning in scanning the bodies.
Still , love & arrange both r success ful, it is up to u how u fell the relations.
Ask u r grand mother , when she start loving ur grand fathe ?

अम्बरीश अम्बुज ने कहा…

main pahle bhi aaya tha par bina comment diye chala gaya tha... aapne dubaara mail karke bulaya hai to batate chalein ki main bhi aapka lekh padh kar kisi nateeje par nahi pahunch paaya... shayad soch hi itni viksit nahi hai apni ya fir topic hi hamein interest nahi kar paya... comments padhe saare ki shayad kuch samajh paayein.. par bas itna samajh mein aaya ki shilpa ji ki baat se sahmat nahi hua ja raha.. baaki kuch khaas hai nahi kahne ko... jis din hoga, lautunga jarur...

Nirmla Kapila ने कहा…

अमबरीश् जी की तरह मैं भी पहले पढ कर चली गयी थी। विवाह चाहे एक समझौता ही हो मगर समाज की संरचना के लिये ये समझौता भी जरूरी है। ये भी जरूरी नहीं कि प्रेम विवाह भी कामयाब होते ही हों। मुझे लगता है प्रेम विवाह जलदी टूटते हैं। जब भी कोई रिश्ता जिस्म से जुड जाता हौ तो अधिक देर रुहानी नहीं रह सकता। जिस्मानी अर्थात पति पत्नि के रिश्ते के साथ कुछ व्यक्तिगत आपेक्षायें होने लगती हैं जिस से रुहानी प्यार अधिक देर नहीं रहता मगर फिर भी बहुत से लोग ऐसे हैं जो इस रिश्ते को खुशी से निभा रहे हैं। मेरा मानना है कि रूह और जिस्म दो अलग अलह चीज़ें हैं अगर उन का आपस मे संबन्ध हो जाये तो उनमे से एक ही चीज़ रह सकती है या केवल जिस्मानी रिश्ता या फिर रुहानी। फिर भी विवाह सब से अधिक विश्वसनीय रिश्ता है। वैसे शरद जी ने भी सही कहा है कि हर रिश्ते की एक उम्र होती है। अगर विवाह से कोई भी खुश नहीं है तो ऐसा रुहानी रिश्ता भी आज कल कहाँ देखने को मिलता है?अपको वो रुहानी तब तक लगता है जब तक लोई लिसी तरह की जोम्मेदारी या आपेक्षा नहीं है वर्ना रूह को टूटते देर नहीं लगती। इस लिये विवाह ही श्रेष्ठ बन्धन है। शुभकामनायें

ASHISH ने कहा…

Ambrish ji,
Aapki comment pdh kar aapke blog par gaya tha. Aap umar me aur tajurbe me beshak mujhse chhote hain!
Der-saver, aapko bhi shayad meri vartmaan manosthiti se do-chaar hona padega!
Haan, aapka chat wala post padha, rochak laga!

ASHISH ने कहा…

Nirmla ji,
Shubhkamnaon ke liye dhanyawad!
Kul milake matlab ye hai, ke main fizool ki batein soch raha hoon!
Hari ka naam lekar chadh jana chahiye sooli par!
:-0

Nirmla Kapila ने कहा…

aahseesh jee hame bulaana na bhool jana iske siva koi chara bhee nahin hai badhaI aur aasheervaad

prashant ने कहा…

Wether love marriage or arrange marriage...
Wether compromise or adjustment....
These are all secondary issues..to understand these and to reach certain conclusions,one need to question the institution of marriage itself...Is it a compromise which is necessary or is it an evolution process of a human being which is imperative for his survival.. Is it a responsibility which make u more responsible or is it a responsibility u want to avoid..Is it a commitment u make for someone's emotional and physical security or is it a medium for sexual gratification..Is it a matter of remaining loyal to one or losing ur freedom to choose..Is it an example to follow for the next generation or it will wreak havoc on their life..Is it a promise u make publicly to someone or is it a promise u make with urself..Is it an adjustment to what other lacks or is it an adjustment to ur exaggerated expectations..Long list of questions and jargon of words but the need is to ponder over these questions..I am sure u will find the answer.

Dr. kavita 'kiran' (poetess) ने कहा…

prem vivah ho ya paramprik jab tak man se man ka milan na oh wah safalnahi ho sakta.yahi sach hai.

ASHISH ने कहा…

Kavitaji,
Swaagat!
Main sahmat hoon!
Na jane kya hoga is Neem chadhe Karele ka?

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।

Charu ने कहा…

Ashish first time likh rahi hu…jaisa Dil ne kha keh rahi hu in simple words….I strongly believe that there is no existence of the term “Body or Physical relationship” for the “Soulmate relationship-Ruhani Rishta”.There are only two souls jo miti hain, pyar karti hain…aur pyar k ek sache Bandhan me dub jaati hain and make this bond ,a neverlasting relation...so whether Love or Arrange, the relationship should be Soul based not body based….

ASHISH ने कहा…

Dear Charu,
I agree in totality with what you have submitted in your comment. The point however, is that how many married couples are into 'Soul-based' relationships?
More so, is it not the physical aspect that is given primacy by one and all? This is the reason why dark becomes wheatish, wheatish is fair, and fair is projected as extremely beautiful in matrimonial advertisements.
That a union of two hitherto unknown people may become soul-based is only a matter of chance!
What if it doesn't happen?

Manoj K ने कहा…

what do u have in mind when u go for grocery shopping, the best, well arranged and no-marks sabji is bought first, it goes out of stock.. ppl have a general tendency to look at the physical aspects.. so is with marriage proposals.

marriages without proper understanding of each other , without thinking of each other's space is equivalent to a compromise, its just like in a job where u think of quitting but u also know u cannot..

what i have gathered in all my years of life and some of my marriage that the body is the entry gate to the soul, it all starts with the body.., u cannot live with someone to test, how compatible you are, the live-in relationship are just a waiting hall to get out to something new, so its better to understand than to adjust or compromise

aur is se aage hamara dimag kam nahi karta :))