केमिकल लोचे के शिकार.....

पहचान कौन???

मेरी फ़ोटो
मैं कौन हूँ, मैं क्या कहूं? तुझमे भी तो शामिल हूँ मैं! तेरे बिन अधूरा हूँ! तुझसे ही तो कामिल हूँ मैं!

आपको पहले भी यहीं देखा है....!!!

गुरुवार, 13 जून 2013

थर्टीन ट्रैवल स्टोरीज़!!!

प्यारी सहेलियों और यारों,  
जब से एक, दो, तीन..................... बारह का तेरह हुआ है, पाँव में चक्कर सा लग गया है, मैं घनचक्कर सा हो गया हूँ, पंख लगाकर बस उड़े ही जा रहा हूँ! और सच कहूँ तो ये एक ख्वाब को जीने जैसा है! भीतर का बंजारा फुल एन्जॉय कर रहा है इस आज़ादी को, और इस ढ़पोरनामे में कुछ घुमक्कड़ी के किस्से ही शेयर करना चाहता हूँ: 

पोस्टर का पोस्ट से कुछ लेना देना नहीं!
बस यही बताना है कि 'देयर इज़ नो फ्री लंच'!
दान दो और धर्म लाभ उठाओ!




ब्रैड स्टिक्स विद टोमेटो सूप
राजधानी एक्सप्रेस में ये मेरा पहला सफ़र था: नयी दिल्ली से अहमदाबाद! केटरिंग वाला भैय्या एक ट्रे सी पकड़ा गया जिसमे एक अमूल मक्खन की टिकिया थी, एक खाली कप था, कुछ नमक और काली मिर्च और एक पाऊच में मुलैठी जैसी दो लकडियाँ! पढ़ा तो पाया के वो ब्रैड स्टिक्स थीं! बहुत सखत थीं! फिर जब सूप सर्व किया गया तो सामने वाले को देख-देख सब आपस में एडजस्ट किया! ये वैसी ही सिचुएशन थी जैसी के पहली मर्तबा एक हाई-फाई रेस्तरां में खाने के बाद 'नींबू-स्लाईस इन वार्म वाटर इन ए बाउल' दिए जाने पर हुई थी! मुझे लगा के हाजमे के लिए होगा! फिर पता चला हस्त-प्रच्छालन के लिए है!!! वैसे सूप बकवास था! (बाद में इसी ट्रेन के फर्स्ट एसी में भी ट्रैवल किया, बहुत मज़ा आया) 

मोदीफाईड 
अहमदाबाद पहुँच के कालूपुर स्टेशन के बाहर पान्ज्रापोल जाने वाली बस का इंतज़ार कर रहा था! ऑटो वाले भयंकर पीछे पड़ गए, पर मेरी आत्मा भी बनिए के वश में है! निश्चय पक्का कर खड़ा रहा बस की वेट में! इस बीच एक ऑटो वाले भैय्या ने मुझ पर बहुत सारी गुजराती गिरा दी! मैंने कन्फ्यूज़ होकर फाइनली कहा: "गुजराती आतो नथी"! वो ऑटोभाई ज़ोर से हँसे और बोले: "सीख लीजिये! मोदी पीएम होने जा रहे हैं!" 

होटल सिगार
सिगार से पुरानी फिल्मों के बैड मैन अजीत याद आ जाते हैं या फिर खरी-खरी कहने वाले श्रद्धेय बालासाहेब! मलयालम थर्टीन में बता चुका हूँ के केकड़े, झींगे, मछलियाँ, और ना जाने क्या-क्या अल्लम-बल्लम की बहुतायत में घनघोर वेजिटेरियन होने से कितनी परेशानी हुई! हल ढूँढते-ढूँढते हमें होटल सिगार के बारे में पता चला! साथ वाले लड़कों को शराब और सुट्टे की भी तलब थी! और होटल का नाम सुनके तो उन्होंने मन-ही-मन में जाने कितनी बार गा लिया होगा: "तेरा प्यार प्यार प्यार, हुक्का बार!!!" जिज्ञासा तो मेरे मन में भी थी के ये क्या नाम हुआ?! खैर सूंघते-सूंघते जब हम मंज़िल पर पहुँचे तो हमें 'होटल स्वीकार' मिला! मेरी जान में जान आई और साथ वालों का हो गया पोपट! मल्लू प्रोननसिएशन ने खामखां लड़कों से कसरत करा दी!!!  

वैज जयपुरी इन कोज्हिकोड
थक हार कर जब तशरीफ़ के टोकरे रखे तो एक वेटर पानी रख गया! मैंने ग्लास छूते ही बिजली की गति से वापिस खींच लिया! कारण? पानी खौलता हुआ गर्म था! क्यूँ? पता नहीं! ऑर्डर देने के समय समझ ही नहीं आया के क्या मंगायें! किस्मत अच्छी थी के ऑर्डर लेने वाला लड़का बंगाली था! वो हमारी स्थिति समझ गया और हेल्प की चूज़ करने में! हमने भी कम्प्लीट सरंडर कर दिया! खैर वो जो लाया 'नॉर्मल' कंडीशन में तो ना खाऊँ मैं, पर "नींद ना देखे टूटी खाट और भूख ना देखे झूठा भात"! एक सब्ज़ी तो टमाटर की प्यूरी जैसी थी, आधी-अधूरी टोमैटो कैचप समझ लो! और दूसरी जिसे  वो वैज जयपुरी कह रहा था, उसमें टमाटर-प्याज़ की पतली सी ग्रेवी में शिमला मिर्च और काजू तैर रहे थे! और दोनों ही सब्ज़ियों में नारियल की प्रचंड घुसपैठ! रोटी अधपकी सी थी! टूट पड़े तीनों! वैसे मैं वैचारिक तौर पर ग्लोबलाईज़ेशन का विरोध करता हूँ, पर कसम से अगर वहां मैकडॉनल्ड होता तो क्या मस्त होता!!! 

द डिफिकल्ट लाईफ इन हिल्स
गढ़वाल वाले श्रीनगर गया तो अहसास हुआ के हमारी लाईफ कितनी आसान है! टेढ़े-मेढ़े पहाड़ों पर रेंगती मिनी-बस से खाई में पाताल नहीं सीधा ब्रह्मलोक नज़र आता था! एक-दो जगह तो फ्रेश चट्टानें गिरी हुई मिलीं! और किसी-किसी मुश्किल मोड़ पर मुझमें और मौत में इंचों का फासला था! बस ड्राईवर की सावधानी और एलर्टपने पर कितनी ज़िंदगियाँ निर्भर थीं! और तब ख्याल आया के हम कितनी चीज़ों को 'टेकन फॉर ग्रांटेड' लेते हैं! बस ये समझ लो बद्रीनाथ के आधे रास्ते से वापिस आ गया! वैसे मैंने बद्री अंकल से पहले मुलाक़ात की है! पर फूलों की घाटी छूट गई थी! जायेंगे कभी, इंशा'अल्लाह! और दिल तो मेरा ऋषिकेश में राफ्टिंग और कैम्पिंग पे भी आ गया था!  

ए सरदार इन इंदौर
इंदौर में कुछ भी बेगाना या नया नहीं लगा! सब कुछ अपने उल्टे आई मीन उत्तम, अरे उत्तर प्रदेश जैसा! वही चिर परिचित मम्मी-सिस्टर की गालियाँ, वही गंद, और वो सब कुछ जिसकी वजह से मैं यूपी से इलेवन टू थर्टीन होना चाहता हूँ! एअरपोर्ट से निकला तो टैक्सी वालों ने घेर लिया! बचता-बचाता मैं ऑटो स्टैंड पे पहुँचा, ये सोचकर के ऑटो जेब पर भी हल्का पड़ेगा और आर-पार की हवा भी मिल जाएगी! साथ में एक सरदार भी मिल गया! ऑटो भी शेयर किया और अगले दिन में होटल का रूम भी! बंदा जॉली गुड था! जब खुल गए आपस में तो पता था के बात दारू तक पहुंचेगी ही! जब मैंने कहा के मैं नहीं पीता तो वो ऐसे ही चौंका जैसे पंजाब प्रवास के दौरान मेरे दारुलैस वेजिटेरियन होने पर सब चौंकते थे! खैर सिंह इज़ किंग मुझे सोशल-साईकोलोजीकल-बायोलोजीकल लोजिक्स देकर अपने साथ इंग्लिस ठेके (अरे प्रॉपर बार था!!!) पर ले गया! एक किंगफिशर की बीयर और एक पैग व्हिस्की पीते-पीते उसने मुझे समझाया के मैं ज़िन्दगी में कितना कुछ मिस कर रहा हूँ! वैसे पीनट-चाट टेस्टी थी!!!

रोड-साईड पोहे एण्ड हैल्दी फ्लर्टिंग 
वापसी में सुबह एअरपोर्ट के सामने एक ढ़ाबे टाईप झोंपड़े में पोहे खाए, वो भी रज के! सरदार ने सिर्फ मैंगो शेक पिया! अब चौंकने की बारी मेरी थी! इस दुनिया में पोहे कौन नहीं खाता!? एअरपोर्ट में दो युवा महिला यात्रियों से सिर्फ 'निर्मल आनंद' हेतु फ्लर्टिंग करी! वो भी एन्जॉय कर रही थीं! मसलन, किसी बात पर एक बोली: "आई कैन सी थ्रू ए लॉट ऑफ़ थिंग्स (मैं बहुत सी चीज़ों के आर-पार देख सकती हूँ)!" मैंने तुरंत अपने लज्जा-वस्त्रों को हाथों से ढ़का और बोला: "व्हाट आल थिंग्स आर यू टॉकिंग अबाउट!!!" और फिर हम चारों हँसते रहे! वैसे फ्लर्टिंग सेहत के लिए अच्छी होती है! जस्ट लाईक योगा! मैं नहीं कह रहा हूँ, रणबीर कपूर ने कहा है, 'ये जवानी है दीवानी' में! झूठ थोड़े ही बोलेगा? ऋषि कपूर का लड़का है!!! 

टू-एंड-फ्रो इंदौर
मेरे साथ मुनीमजी की दी हुई रेवोल्यूशन 20-20 थी! और इरादा भी था उसे पढ़ने का, मगर बड़े बाउजी (सरल भाषा में भगवान) को कुछ और ही मंज़ूर था! अरे भई, होई-सोई जो राम रचि राखा! हाथ में लिखा हुआ प्रोज़ था और बराबर वाली सीट पे जीती-जागती पोएट्री आकर बैठ गई! फिर भी मैं चेतन का भगत बना रहा! लेकिन जब पोएट्री को नींद आई और मेरे कंधे पर सिर एडजस्ट करके सो गई, तो मन-ही-मन चेतन से पूछा, के भगत बाबू, ऐसे में आप क्या करते? मैंने भी वही किया! किसी को कच्ची नींद से जगाना अच्छी बात है क्या? 
आते समय सन ऑफ़ सरदार साथ था! उसे सोना था और मुझे रेवोल्यूशन 20-20 में खोना था! लेकिन अगली सीट पर बैठे एक परिवार ने ऐसा होने ना दिया! एक मियाँ, एक बीवी, और दो बच्चे! चारों ने धूप के चश्में पहने हुए थे! बच्चों ने रो-धो के ब्रह्माण्ड सिर पर उठाया था! मियाँ-बीवी केवल इंग्लिश में बतिया रहे थे और वो भी इतने एटिकेट्स के साथ, मन में ख्याल आ ही गया के ये चिंटू-चिंकी कैसे हो गए?! फ्लाईट इंडिगो थी! नो फ्री लंच! शायद उन्हें पता नहीं था! उन्होंने उड़न-तश्तरियां सजवा लीं! फिर जब एयर होस्टेस ने मुस्कुराते हुए पैसे माँगे, तो उन्होंने आईटमें कम करवाईं! मुझे लगा चलो जितनी देर खायेंगे, चुप रहेंगे! लेकिन उन्होंने अपने-अपने स्नैक्स भी डिस्कस किये, वो भी इंग्लिश में! 

गंगा-स्नान ऑन बुद्ध-पूर्णिमा 
मुझे गंगा में नहाने का बचपन से ही बहुत शौक़ रहा है! शुरू-शुरू में धार्मिक फीलिंग भी होती थी! फिर धीरे-धीरे पापा द्वारा पैदा की गई ये फीलिंग्स भी गंगा में बेइंतेहा पापों के साथ धो दीं! अबकी बार हुआ यूँ के बिजली बहुत तंग कर रही थी! इनवर्टर हाथ खड़े कर चुका था! और तभी अचानक रात को साढ़े दो बजे बिजली के तारों में भयंकर स्पार्किंग हुई! मन में ख्याल आया के अब तो बिजली आएगी नहीं, तो क्यूँ ना बुद्ध-पूर्णिमा का फायदा उठा लिया जाए! बस पौने-तीन तक पिरोगराम बना और इससे पहले पिताजी को किन्तु-परन्तु का मौका मिलता, मैं उन्हें बाईक पर बैठा चुका था और हम निकल पड़े थे बिजनौर के लिए! पाँच बजे सुबह हमने पहला गोता लगाया! पापा के हर ग्यारह गोतों पर मैंने तेरह गोते लगाये! पता नहीं ये कैसा है तेरह का फेर! गंगा में नहा कर मम्मी और याद आती है! खैर पब्लिक ने जबतक घरों से गंगाजी के लिए निकलना शुरू नहीं किया था, हम गंगाजी से घर के लिए निकल गए!

शेयर्ड बर्थ इन आश्रम एक्सप्रेस
फिर से अहमदाबाद गया! इस बार मुनीमजी साथ थे! एक अंकल वेटिंग में सफ़र कर रहे थे! रात को जब सब सीधे होने लगे तो अंकल फर्श पर चादर बिछाने लगे! अटपटा तो लगा लेकिन रिज़र्वेशन तो था नहीं, फिर क्या करते?! तभी मुनीमजी ने कहा हम अपनी एक बर्थ अंकल को दे देते हैं! अंकल ने झूठ-मूठ में ना-नुकुर की, और फिर ऐसे पसर गए जैसे बर्थ घर से ही लाये हों! सोच रहे होंगे, 'अच्छे फुद्दू मिले'!!! सोना तो हमें वैसे भी नहीं था, अब एक बहाना मिल गया! फिर? फिर क्या! लाईटें बंद हो गईं! यार को मैंने, मुझे यार ने सोने ना दिया!!! सुबह कब हुई, पता नहीं चला! ये ज़िन्दगी भर का पॉइंट मिल गया मुझे मुनीमजी को छेड़ने का कि उन्होंने ग़ैर की मदद का बहाना बना कर सोची-समझी साजिश के तहत मुझे फँसा लिया!!!

होटल डिसेंट या डिसेंट होटल
'जब वी मेट' में घंटे के हिसाब से अवेलेबल होटल डिसेंट याद है?! ऐसे तीन होटल डिसेंट अहमदाबाद से मेहसाणा के रास्ते में अडालज के पास हमें मिले! वाशरूम मेरी प्रायोरिटी होती है! अगर साफ़ है तो कमरा उन्नीस भी चल जाएगा, पर अगर गन्दा है तो कमरा फिर चाहे पच्चीस भी क्यूँ ना हो! जब हमने इंचार्ज को दिखाया के कोमोड टूटा है, फ़्लश चल नहीं रहा, तो उसने कहा के ये प्रोब्लम तो सभी रूम्स में है! हमने कहा: "मतलब?" तो उसने बताया के सर यहाँ पर कपल्स आते हैं, उन्हें इस सब की ज़रुरत नहीं होती!!! हमने कहा: "हैं!!!" और फिर मैं और मुनीमजी खूब हँसे! कमोबेश यही हाल बाकी दोनो होटल्स का था! उन्होंने साफगोई से एक्सेप्ट तो नहीं किया! पर उनके हाव-भाव से स्पष्ट था के वे सभी होटल डिसेंट ही थे! फाइनली हम अहमदाबाद में एक 'डिसेंट' होटल में ठहरे!

फर्स्ट टाईम इन फर्स्ट एसी
रिटर्न जर्नी का टिकट राजधानी फर्स्ट एसी से था! अपने कैबिन में मैं, मुनीमजी, एक राजस्थानी दीदी और एक एक्स एमपी थीं! बोले तो, फीमेल:मेल का रेशिओ थ्री:वन था! टीसी अंकल भी मस्त नमस्ते बोले! वैलकम ड्रिंक के तौर पर फ्रूटी पिलाने के बाद एक बंदा सबको लाल गुलाब दे गया! मैं क्या करता? नहीं लिया! फिर रिफ्रेश्मेंट्स! और डिनर से पहले सूप! हाँ, यहाँ सूप में चॉइस थी! एमपी आंटी ने पता नहीं क्या मंगाया! शायद कुछ मंचूरियन सा था! दीदी ने मिक्स्ड वेज, मुनीमजी ने स्वीटकोर्न, मैंने वही टमाटर! बाकायदा बाउल्स में सर्व किया गया! अब तक मुझे पता था के ब्रैड स्टिक्स का क्या करना है!!! एक भैय्या फ्रूट बास्केट रख गए! अच्छे रसीले सेब और नॉर्मल से केले! खाना भी प्रॉपर बर्तनों (बॉन चाइना?) में खिलाया गया! कुल मिलाके, ठीक ठीक लगायें तो वैल्यू फॉर मनी! एमपी आंटी कभी सत्तर के दशक में एमपी रही होंगी, पर फीलिंग पूरी ले रही थीं! वहीँ, राजस्थानी दीदी, मुनीमजी और मैं, तीनों 'फर्स्ट टाईम इन फर्स्ट एसी' थे! सोने का नंबर आया तो पहले एमपी आंटी का, फिर मुनीमजी का, फिर राजस्थानी दीदी का बिस्तर लगाया! दीदी बोले, "चलो आपका बिस्तर भी लगा देते हैं!" मैंने मुनीमजी की बर्थ की तरफ इशारा किया और कहा, "ये लग तो गया!" दीदी मुस्कुराये और फिर इधर-उधर देखने लगे! 

द नेक्स्ट डेस्टिनेशन 
अगर आप अब भी पढ़ रहे हैं तो ये भी जान लीजिये: मेरे मस्तक की रेखाओं में स्पष्ट लिखा है के अगली यात्रा निकट भविष्य में दक्षिण दिशा में होगी! कोई ऐसा स्थान जहाँ पर्वतों का समागम समुद्र से होगा! और एक और यात्रा जो नुसरत बाउजी की क़व्वालियों को ज़रिया बनाकर रूहों को इश्क़ की मैराज तक ले जाएगी..... या शायद उससे भी आगे! क्यूंकि, आसमां के पार शायद एक नया आसमां होगा.......!!! 

23 टिप्‍पणियां:

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

padhte padhte kho sa gaya ashish bhai....dil khush hee kar dete ho aap to yaar...mazaa aa gaya!!

दिगम्बर नासवा ने कहा…

इतने किस्से एक ही बार में ... पर मज़ा आ गया ... वैसे जितने का खाना देते हैं राजधानी में उतने के दाम कर देन तो ज्यादा अच्छा है ... वैसे इंदौर जैसे सरदार हर जगह मिल जाते हैं ... यही तो खूबी है इन सरदारों की ...
अच्छी लगी पूरी पोर्ट ... रोचक ...

Indu Puri ने कहा…

terah hi kahaniyan pdh li maine ek saans me P: mja aa gaya ji!
(jwab 13 shbdon me. gin lo ha ha ha )

Indu Puri ने कहा…

किसी को कच्ची नींद से जगाना अच्छी बात है क्या?; bilkul nhiiii ji :P
(fir 13 shbd. ykeen nhi?? gin lo

बेनामी ने कहा…

वैसे भगत के साथ परसाई जी को भी पढ़ते ही होगे ये बात तो पक्की है
और इंदौर के ज़िक्र-ए -मुबारक पर क्या कहूँ !!!
दिल सेन्टी सेन्टी हो आया. वैसे एक राज़ की बात बताओ,सरदार , इन्दौर , दोनों
को एक साथ कैसे पचा गए!!!
:)

thefemaleme ने कहा…

बेहद उमदा लिखा है आशीष। पर यकीन नहीं हो रहा की रात के 'साढ़े दो' बजे बिजली की तारों में भयंकर स्पार्किंग हुई :) और हाँ पु दी रे का ज़िक्र नहीं किया जनाब आपने?

पंकज मिश्रा ने कहा…

वाह!!!! दे दनादन कर दिया। वैसे अच्छा होता अगर अनुभवों को एक-एककर बताते। वैसे ये भी अंदाजे बयां अच्छा है।

Yashwant Mathur ने कहा…

चलिये बॉस आपके बहाने हमने भी फ्लाइट और राजधानी के मजे ले लिये :)
वरना तो यह सब सपना है अपने लिये :)

बहुत मज़ेदार अंदाज़ में यात्रा संस्मरण लिखा है।


सादर

Roshani ने कहा…

:)

Yashwant Mathur ने कहा…

आपने लिखा....हमने पढ़ा
और लोग भी पढ़ें;
इसलिए आज 15/06/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक है http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
आप भी देख लीजिए एक नज़र ....
धन्यवाद!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सारे संस्मरण रोचक ....

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत रोचक यात्रा संस्मरण....

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

ऋषि कपूर का लड़का है तो क्या झूठ नहीं बोल सकता .....:))

मजेदार किस्से ....
पर एक साथ इतने ....?
राजधानी में एक और खूबी है आपको दिया गया खाना पसंद न हो तो स्पेशल आर्डर द्वारा और मनवाया जा सकता है मसलन चाउमीन , या कोई स्पेशल सब्जी , परांठा आदि ....हाँ ये टिप भी ५० , १०० रुपये से कम नहीं लेते .....

रचना दीक्षित ने कहा…

ये किस्से तो काफी मजेदार लगे. अब अगले डेस्टीनेसन का बेसब्री से इन्तेज़ार है.

rohitash kumar ने कहा…

इक बार में इतनी कहानियां ..वो भी इतनी छोटी-छोटी...पर अपने में पूर्ण....अगली यात्रा वर्णण का इंतजार रहेगा

संजय अनेजा ने कहा…

सैर कर दुनिया की आशीष :)

Rizwana Ansari ने कहा…

bahut maza aaya is post ko padhkar..
..

Parul kanani ने कहा…

bahut samay bhatkne ke baad idhar ka rasta pakda hai...aur man gadgad hai :) :)

Anurag Sharma ने कहा…

गजब!

monali ने कहा…

:) mazedaar :)

संजय अनेजा ने कहा…

कित्थे है काके? आज चौदह जुलाई भी खत्म होने वाली है यार।

lori ali ने कहा…

arsa hua, aap k didar nahi hue,
blog ki galiyaan sunsan hai, aaye koi......:)

वाणी गीत ने कहा…

आपकी घुमक्कड़ी ,पाठकों को कई किश्ते एक साथ.
बहुत बढ़िया !